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Showing posts from October, 2015

Nationalism

राष्ट्रधर्म   गांधी तुम चाहते तो लालकिले पर , भगवा फहरा सकते थे।   तुम चाहते तो तिब्बत पर भी, झंडा लहरा सकते थे।  तुम चाहते तो जिन्ना को , चरणो में झुकवा सकते थे।  तुम चाहते तो भारत का , बंटवारा रुकवा सकते थे।   तुम चाहते तो अंग्रेज़ो का, मष्तक झुकवा सकते थे।  तुम चाहते तो भगत सिंह की , फांसी रुकवा सकते थे।  सन सैतलिश में ही भारत माँ को , पटेल मिलना तय था।   लेकिन तुम तो  अहंकार के , घोर नशे में झूल गए थे।  गांधी नीति याद रही पर , भारत माँ को भूल गए थे। सावरकर से वीरों पर भी , अपना नियम जता डाला। गुरु गोविन्द सिंह और प्रताप को , भटका हुआ बता डाला।  भारत के बेटों पर अपने , नियम थोपकर चले गए।  बोस और पटेल की छाती पर , छुरा घोप कर चले गए।  तुमने पाक बनाया था वो , आज भी कफ़न तौलता है।   तुमको बापू कहने तक में, अपना खून खौलता है। सुन साबरमती के वासी , सोमनाथ में ग़ज़नी आया था।   जितना पानी नहीं बहा , उतना खून बहाया था।  सारी धरती लाल पड़ी थी , इतना हुआ अँधेरा था।  मैं च...