राष्ट्रधर्म गांधी तुम चाहते तो लालकिले पर , भगवा फहरा सकते थे। तुम चाहते तो तिब्बत पर भी, झंडा लहरा सकते थे। तुम चाहते तो जिन्ना को , चरणो में झुकवा सकते थे। तुम चाहते तो भारत का , बंटवारा रुकवा सकते थे। तुम चाहते तो अंग्रेज़ो का, मष्तक झुकवा सकते थे। तुम चाहते तो भगत सिंह की , फांसी रुकवा सकते थे। सन सैतलिश में ही भारत माँ को , पटेल मिलना तय था। लेकिन तुम तो अहंकार के , घोर नशे में झूल गए थे। गांधी नीति याद रही पर , भारत माँ को भूल गए थे। सावरकर से वीरों पर भी , अपना नियम जता डाला। गुरु गोविन्द सिंह और प्रताप को , भटका हुआ बता डाला। भारत के बेटों पर अपने , नियम थोपकर चले गए। बोस और पटेल की छाती पर , छुरा घोप कर चले गए। तुमने पाक बनाया था वो , आज भी कफ़न तौलता है। तुमको बापू कहने तक में, अपना खून खौलता है। सुन साबरमती के वासी , सोमनाथ में ग़ज़नी आया था। जितना पानी नहीं बहा , उतना खून बहाया था। सारी धरती लाल पड़ी थी , इतना हुआ अँधेरा था। मैं च...
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