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Showing posts from 2017

समझो यार बनारस है !

जो तू बोले, जो मैं बोलूं, हर वो अल्फ़ाज़ बनारस है अपने हिन्द में सर्व सनातन, युग का आगाज़ बनारस है  छेड़ रहा जो मन ही मन में, दिल का राग बनारस है केंद्र बिंदु है ये विश्व का, शिव का ताज बनारस है महादेव की धरती है ये, रूद्र का आभाष बनारस है  ओढ़े जो बुद्ध पधारे शांति का, वो लिबास बनारस है  पंडित मोमिन सबकी प्याली में, समरसता का नाम बनारस है चढ़े न उतरे चढ़ता जाये,  ऐसा  जाम बनारस है  तलाश शांति की ख़त्म हो जहाँ, वो गंतव्य बनारस है  शिव की गंगा बहती जाये, वो वक्तव्य बनारस है  आरम्भ यदि है शंख की नाद,साँझ में अज़ान बनारस है  शिव नगरी में राम ही राम हैं, ऐसा धाम बनारस है  तीन लोकों में एक मिले ,तो समझो यार बनारस  है  जाति धर्म  से  ऊपर है ये ,प्रेम का घर बार बनारस  है  नमाज़ी की मंज़िल भी है, गंगा की  धार   बनारस  है वरुणा और अस्सी के बीच, संसार का सार बनारस  है   जले  चिता  तो  मुक्ति  समझो, मोक्ष  का  नाम...

नक्सलवाद, जिम्मेदार कौन? - I

"थाकल बाप के आँख के आशा के नाम ह नक्सलबाड़ी..!"  जी हाँ यही गूंजा करता है आज भी.. भारत के अनेक राज्यों में.. सशस्त्र आंदोलन की एक नयी सोच.. जो आज ज़हर की तरह फैल चुकी है.. कानू सान्याल जी, जो कि नक्सलवाद के प्रणेता थे.. जब वे चारू मज़ूमदार के साथ मिलकर नक्सल आंदोलन को शुरू किया था.. इनका ध्येय था कि गरीब और किसानों को उनका हक मिले। दबे कुचले लोगों के अन्दर चिंगारी तो थी ही.. बस इस आंदोलन ने उसे हवा दे दी और शोले बन गए। आज दुनिया में कानु सान्याल और चारु मजुमदार तो नहीं है परन्तु उनका राजनीतिक और सैद्धांतिक प्रारुप का वो आंदोलन आज भटक गया है। उनका मानना था कि हथियार जनता के हाथ में हो, उसका इस्तेमाल हक के लिए किया जाए। उन्हे तो नक्सलवाद शब्द से ही आपत्ति थी। उन्हे अंतिम चरण में ऐसा लगने लगा कि शायद उनसे गलती हो गयी थी। उनके सिद्धांत को संशोधन मान कर नक्सलियों ने वामपंथी ताकतों को एकजुट किया। कई ऐसे भी नक्सली संगठन है जो की अब राजनीतीक पार्टी बन चुकी है और बाकायदा चुनाव में हाथ आजमाती है। यह नक्सल शब्द आया नक्सलबाड़ी से, जो कि पश्चिम बंगाल में एक गाँव है, वहाँ के रहने या इस ...

सत्ता का स्वाद

होली का माहौल पुरी तरह से तैयार हो चुका है, पुरा देश खास कर उत्तर प्रदेश चुनावी रंग में रंग चुका है। ये देखना बेहद दिलचस्प होगा कि 11 मार्च को किसकी गुलाल उड़ेगी और किसके चेहरे का रंग उडे़गा।  देखिए राजनीति में कुछ कहा नहीं जा सकता। अभी कुछ दिन पहले BMC चुनाव में अलग अलग लड़ने वाली शिवसेना और भाजपा, अब एक दुसरे के साथ नजर आरही है। देखिए चुनावी समीकरण का सटीक आँकलन करना बेहद मुश्किल है। अभी देखिए राहुल गांधी और अखिलेश यादव एक साथ आ गए हैं। रैलियों की बौछार सी हो गई थी पिछले दिनों में। अखिलेश भैया का काम बोल रहा है, उनके कैबिनेट मंत्री गायत्री प्रजापति बलात्कार केस में फरार हैं.. कांड बोल रहा है यूपी में। कानपुर और लखनऊ में छिपे आतंकी का पता भी इन्हें मध्यप्रदेश पुलिस बताती हैं.. कारनामा बोल रहा है। कुछ सपा वाले मित्र कह रहे हैं की हमने गुजरात को जलते देखा है, यूपी में नहीं होने देंगे, मैं कहता हूँ सर आपने गुजरात जलते देखा तो शायद गोधरा भी जलते देखा होगा, वो भी गुजरात में ही है। इसपर एकदम सन्नाटा पसर गया। भैया देखिये ये जो सेकुलरीज्म यानी धर्मनिरपेक्षता है वो केवल एक मुखौटा है...