राष्ट्रधर्म
गांधी तुम चाहते तो लालकिले पर , भगवा फहरा सकते थे।
तुम चाहते तो तिब्बत पर भी, झंडा लहरा सकते थे।
तुम चाहते तो जिन्ना को , चरणो में झुकवा सकते थे।
तुम चाहते तो भारत का , बंटवारा रुकवा सकते थे।
तुम चाहते तो अंग्रेज़ो का, मष्तक झुकवा सकते थे।
तुम चाहते तो भगत सिंह की , फांसी रुकवा सकते थे।
सन सैतलिश में ही भारत माँ को , पटेल मिलना तय था।
लेकिन तुम तो अहंकार के , घोर नशे में झूल गए थे।
गांधी नीति याद रही पर , भारत माँ को भूल गए थे।
सावरकर से वीरों पर भी , अपना नियम जता डाला।
गुरु गोविन्द सिंह और प्रताप को , भटका हुआ बता डाला।
भारत के बेटों पर अपने , नियम थोपकर चले गए।
बोस और पटेल की छाती पर , छुरा घोप कर चले गए।
तुमने पाक बनाया था वो , आज भी कफ़न तौलता है।
तुमको बापू कहने तक में, अपना खून खौलता है।
सुन साबरमती के वासी , सोमनाथ में ग़ज़नी आया था।
जितना पानी नहीं बहा , उतना खून बहाया था।
सारी धरती लाल पड़ी थी , इतना हुआ अँधेरा था।
मैं चीख चीख के कहता हूँ , हाँ ग़ज़नी एक लूटेरा था।
सबक यही से ले लेते तो , घोर घटाए न छाती।
भगत सिंह फांसी पर लटके , ऐसी नौबत नहीं आती।
अंग्रेज़ों से लोहा लेके , लड़ना हमे सीखा देते।
कसम राम की बिस्मिल इनकी, ईंट से ईंट बजा देते।
अगर भेड़िया झपटे तो , तलवार उठानी पड़ती है।
गला उसका काट कर , अपनी जान बचानी पड़ती है।
छोड़ अहिंसा कभी कभी , हिंसा अपनाना पड़ता है।
छोड़ अपने सिद्धांतो को , राष्ट्र धर्मं निभाना पड़ता है।
तू याद रख मेरे देश के वासी , जब करनी हो धर्म की स्थापना।
त्याग के बंसी कृष्ण को भी , सुदर्शन चक्र उठाना पड़ता है।
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