"थाकल बाप के आँख के आशा के नाम ह नक्सलबाड़ी..!" जी हाँ यही गूंजा करता है आज भी.. भारत के अनेक राज्यों में.. सशस्त्र आंदोलन की एक नयी सोच.. जो आज ज़हर की तरह फैल चुकी है.. कानू सान्याल जी, जो कि नक्सलवाद के प्रणेता थे.. जब वे चारू मज़ूमदार के साथ मिलकर नक्सल आंदोलन को शुरू किया था.. इनका ध्येय था कि गरीब और किसानों को उनका हक मिले। दबे कुचले लोगों के अन्दर चिंगारी तो थी ही.. बस इस आंदोलन ने उसे हवा दे दी और शोले बन गए। आज दुनिया में कानु सान्याल और चारु मजुमदार तो नहीं है परन्तु उनका राजनीतिक और सैद्धांतिक प्रारुप का वो आंदोलन आज भटक गया है। उनका मानना था कि हथियार जनता के हाथ में हो, उसका इस्तेमाल हक के लिए किया जाए। उन्हे तो नक्सलवाद शब्द से ही आपत्ति थी। उन्हे अंतिम चरण में ऐसा लगने लगा कि शायद उनसे गलती हो गयी थी। उनके सिद्धांत को संशोधन मान कर नक्सलियों ने वामपंथी ताकतों को एकजुट किया। कई ऐसे भी नक्सली संगठन है जो की अब राजनीतीक पार्टी बन चुकी है और बाकायदा चुनाव में हाथ आजमाती है। यह नक्सल शब्द आया नक्सलबाड़ी से, जो कि पश्चिम बंगाल में एक गाँव है, वहाँ के रहने या इस ...
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